La Ilaha Illallah Muhammadur Rasulullah

September 15th, 2020

Is post mein ham parhenge La Ilaha Illallah Muhammadur Rasulullah hindi mein tafseel se tarjuma ke saath.

एक बड़ी ही प्यारी हदीस है जिसका मफहूम है: हुज़ूर ﷺ ने फ़रमाया: “जिस किसी ने कहा: ला इलाहा इल्लल्लाह जन्नत में दाख़िल हुआ|” हमारे लिए ये कहना कितना आसान है| मगर इसे दिल से महसूस करते हुए कहना ज़्यादा ज़रूरी है|

La Ilaha Illallah Muhammadur Rasulullah Hindi Mein Tafseel

La Ilaha Illallah Muhammadur Rasulullah Hindi Mein

La Ilaha Illallah Muhammadur Rasulullah Hindi Mein

ये अव्वल कालिमा-ए-तय्यिबा है| जो ईमान का दार-ओ-मदार है| जिसने इस अक़ीदत से ये कलिमा पढ़ा वो ईमान ले आया| और जिसका इस पर अक़ीदा नहीं वो ईमान वाला नहीं| ज़रूर पढ़िए → दावत खाने की दुआ

क़ुरआन-ए-पाक में ये कालिमा-ए-तय्यिबा मौजूद है| पारा #26 में सूरह मुहम्मद की आयत #19 और पारा #23 में सूरह साफ्फात की आयत #19 में इसे पढ़ा जा सकता है|

La Ilaha Illallah Muhammadur Rasulullah Tarjuma Hindi Mein

ला इलाहा इल्लाह मुहम्मदुर्र रसूलुल्लाह का हिंदी में तर्जुमा क्या है?

कलिमा-ए-तय्यिबाह का हिंदी में तर्जुमा क्या है?

अल्लाह के सिवा कोई मा’अबूद नहीं मुहम्मद ﷺ अल्लाह के रसूल है|

ALLAH ke siwa koi ma’abood nahi Muhammad (ﷺ) ALLAH ke Rasool Hai.

→ सुरमा लगाने की दुआ

ला इलाहा इल्लाह मुहम्मदुर्र रसूलुल्लाह का हर्फ़ दर हर्फ़ क्या मतलब होता है?

अरबी हर्फ़ ‘ला’

ये अरबी हर्फ़ ‘ला’ हर्फ़-ए-नफ़ी है जिसका मतलब किसी चीज़ या बात को रद्द करना होता है| जब कोई किसी बात को सरासर नहीं मानता है|

तो यहाँ जिसने ‘ला’ पढ़ा उसने इस बात को रद्द कर दिया यानी वो बन्दा उस बात पर यक़ीन नहीं रखता| जिससे ये साबित हो जाता है के ‘कोई नहीं है’

अरबी हर्फ़ ‘इलाहा’

अरबी हर्फ़ ‘इलाहा’ इस्म-ए-मुज़्कर मफ़’ऊली है जो सिर्फ मा’अबूद के लिए आया है| जिसे अरबी में इस्म-ए-मंसूब कहा जाता है| ख़ास यहाँ पर वाहिद किसी की तरफ़ मन्सूब कर के कही जाने वाली बात के लिए आया है|

जिसपर फ़े’अल अमल किया जा सके| मिसाल के तौर पर हम यहाँ इनकार कर रहे है ये एक फ़े’अल है|

जिस किसी ने ‘ला इलाहा’ पढ़ा जिसका मतलब ‘कोई मा’अबूद नहीं’| उसने पूरी अक़ीदत के साथ इस बात से इनकार कर दिया के ‘कोई मा’अबूद नहीं|’

अरबी हर्फ़ ‘इल्ला’

अरबी हर्फ़ ‘इल्ला’ एक पाबन्दी का ज़र्रा है| अरबी में हम इसे ‘अदात हसर’ कहेंगे जिसका मतलब हद तय कर देना या पाबन्द कर देना है|

मिसाल के तौर पर यहाँ जिसने ये हर्फ़ पढ़ा उसने इस बात को भी अक़ीदत से तस्लीम किया के कोई और मा’अबूद नहीं है|

अरबी हर्फ़ ‘अल्लाह’

अरबी में हर्फ़ अल्लाह हालत-ए-फ़े’अली मर्फू’अ है| जो बतौर -फ़े’अल इस्तिमाल होता है| अरबी में हम इसे ‘लफ्ज़ अल-जलालह मर्फू’अ’ कहते है| जिस किसी ने ये कहा उसने इस बात को अक़ीदत से तस्लीम किया यानी क़ुबूल किया के हालत-ए-फ़े’अली मर्फू’अ जो की यहाँ सिर्फ और सिर्फ अल्लाह ही मा’अबूद है|

जिसने ये कलिमा पढ़ा तो उसने अपने ईमान के साथ ये भी क़ुबूल किया के अल्लाह के सिवा कोई और मा’अबूद नहीं है|

ये कालिमा तमाम दुसरे इंसानी बनाए मा’अबूदो को रद्द करता है| और सिर्फ एक ही सच्चे ख़ुदा को ही तस्लीम करता है|

ला इलाहा इल्लल्लाह की फ़ज़ीलत और फ़ायदे हदीस के हवाले से

रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया अपने मुर्दों को ला इलाहा इल्लल्लाह की तलकीन करो|

सुनन इब्न माजह 1444 | दर्जा : सहीह (दारुस्सलाम)

मु’आज़ बिन जबल रदी अल्लाहु त’आला अन्हु कहते है के रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया: 

जिस शख़्स की मौत उस गवाही पर हो के अल्लाह त’आला के इलावा कोई मा’अ बूद बर हक़ नहीं, और मैं अल्लाह का रसूल हूँ, और ये गवाही सच्चे दिल से हो तो अल्लाह त’आला उसकी मग़ फ़िरत फरमा देगा|

सुनन इब्न माजह 3796  | दर्जा : हसन (दारुस्सलाम)

सुमराह बिन जुन्दब रदी अल्लाहु ‘अन्हु कहते है के नबी-ए-करीम ﷺ ने फ़रमाया: 

चार कलमे तमाम कलमों से बेहतर है और जिससे भी तुम शुरू करो तुम्हे कोई नुक़सान नहीं, वो ये है (सुब्हान अल्लाह वल’हम्दुलिल्लाह व ला इलाहा इल्लल्लाहु वल्लाहु अकबर) अल्लाह की ज़ात पाक है, हर सम की ‘हम्द-ओ-सना अल्लाह ही को सज़ावार है, अल्लाह के इलावा कोई मा’अबूद बर हक़ नहीं, और अल्लाह बहोत बड़ा है|

सुनन इब्न माजह 3811 | दर्जा : सहीह (दारुस्सलाम)

अब्दुल्लाह बिन उम्र रदी अल्लाहु ‘अन्हु कहते है के रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:  

इस्लाम की बुनियाद पाँच चीज़ों पर रखी गयी है:

(1) गवाही देना के अल्लाह के इलावा कोई मा’अबूद बर हक़ नहीं, और मुहम्मद ﷺ  अल्लाह के रसूल है, (2) नमाज़ क़ायम करना , (3) ज़कात देना, (4) रमज़ान के रोज़े रखना, (5) बैतुल्लाह का हज करना|

इमाम तिर्मिज़ी कहते है (1) ये हदीस हसन सहीह है| (2) अब्दुल्लाह बिन उम्र रदी अल्लाहु ‘अन्हुमा के वास्ते से कई  सनदों से मरवी है| इसी तरह ये हदीस कई सनदों से अब्दुल्लाह बिन उम्र रदी अल्लाहु ‘अन्हुमा के वास्ते से नबी-ए-करीम ﷺ से आई है | (3) इस बाब में जरीर बिन  अब्दुल्लाह रदी अल्लाहु ‘अन्हु से भी रिवायत है|

जामि’अ अत-तिर्मिज़ी 2609 | दर्जा : सहीह (दारुस्सलाम)

अनस बिन मालिक रदी अल्लाहु ‘अन्हु से रिवायत है के नबी-ए-करीम ﷺ ने अल्लाह त’आला के क़ौल (लनस अलन्नहुम अजम’ईन) हम उनसे पूछेंगे उसके बारे में जो वो करते थे (सूरह अल-हिज्र 92) के मुत’अल्लिक फ़रमाया : ये पूछना  (ला इलाहा इल्लल्लाह) के मुत’अल्लिक होगा| इमाम तिर्मिज़ी कहते है 1– यह हदीस ग़रीब है, 2- हम इसे लैस बिन अबी सुलैम की रिवायत ही से जानते है 3- अब्दुल्लाह बिन इदरीस ने लैस बिन अबी सुलैम से, और लैस ने बशर के वास्ते से अनस से ऐसे ही रिवायत की है, लेकिन उन्होंने इसे मर्फू’अ नहीं किया है|

जामि’अ अत-तिर्मिज़ी 3126 | दर्जा : द’इफ़ (दारुस्सलाम)

अबू हुरैरह र.अ. कहते हैं के,

रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया:

“ईमान की तहत्तर (73) शाखें (सत्तर 70 दरवाज़े) हैं| सब से कमतर रास्ते से तकलीफ़ दाह चीज़ को दूर कर देना है, और सब से बुलंद “ला इलहा इल्लाल्लाह” का कहना है|”

इमाम तिर्मिज़ी कहते हैं:

1. ये हदीस हसन सहीह है|

2. ऐसे ही सुहैल बिन अबी साले’ह ने ‘अब्दुल्लाह बिन दीनार से, ‘अब्दुल्लाह ने अबू साले’ह से और अबू साले’ह ने अबू हुरैरह र.अ. से रिवायत की है|

3. अम्मारह बिन गाज़ियह ने ये हदीस अबू साले’ह से, अबू साले’ह ने अबू हुरैरह र.अ. से, और अबू हुरैरह र.अ. ने नबी अकरम ﷺ से रिवायत की है| आप ﷺ ने फरमाया:
“ईमान की चौंसठ (64) शाखें हैं|”

जामि’अ अत-तिर्मिज़ी 2614 | दर्जा : सहीह (दारुस्सलाम)

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