Kunde Ki Niyaz in Hindi

February 25th, 2022

Rajab ke mahine mein koonde manane aur kunde ki niyaz dilana ka bahot aam aur ghalat riwaz hamare muashre mein phail chuka hai. Kunde kya hote hai, kunde ki haqeeqat aur iski tareekh ke bare tafseel se ham hindi mein yahan parhenge.

Kunde Ki Niyaz in Hindi

Kunde Ki Niyaz

कून्डे की नियाज़

रज्जब उन चार महीनो में से है जिन को अल्लाह ने अज़मत वाले महीने क़रार दिए है| कुण्डों की नियाज़ के बारे में बदक़िस्मती से कुछ लोगो ने इसकी अज़मत को भूलाकर जुछ ऐसी रस्मे बना डाली हे जिन्का इस्लाम से दूर-दूर का भी कोई लेना देना नहीं हे| इन्ही रस्मो में से एक रस्म “कुण्डों की रस्म” भी हे| जो इस महीने की 22 तारीख को मनाई जाती हे|

इस पोस्ट में पढ़ेंगे:

कून्डो की रस्म की हकीकत क्या हे?

इसकी शुरूवात कब और क्यू हुई?

इसकी बड़ी तफसील हे जिसके पीछे हज़रत मुआविया र.अ. की दुश्मनी की एक अजीब तारीख़ छुपी हुई हे जिसे समझने के लिये तारीख़ (इतिहास) समझना जरूरी हे|

रसूलुल्लाह ﷺ की पेशेनगोई (किसी चीझ का उसके होने से बयान कर देने को कहते है) के मुताबिक़ आप ﷺ की वफात के कुछ ही दिनो के बाद फितनो की शुरूवात हो गई थी|

एक तरफ झूठी नबुव्वत के दावेदार खड़े हो गये|

दुसरी तरफ ज़कात का इन्कार करने वालो का फितना सामने आ-गया|

तीसरी तरफ मुनाफिक़ों ने अपने पर फेलाने शुरू कर दिये|

और चौथी तरफ यहुदियो और इसाई ने अपनी इस्लाम से दुश्मनी की कोशिशे तेज़ कर दी गर्जे के इस्लाम चारो तरफ से फितनो के घेरे में आ-गया और मुस्लमानो के दुश्मन इस्लाम को मिटाने के लिये तय्यार हो गये| ज़रूर देखिए→  शाअ-बान के महीने की फ़ज़ीलत

इसी दरमियान शिया फ़िरक़ा पैदा हो गया, जिस्का बनाने वाला “अब्दुल्लाह इबने सबा” यमनी था, जो यहुदी मजहब को मानने वाला था और इस्लाम और मुस्लमानो का बडा दुश्मन था|

अब्दुल्लाह इबने सबा बहुत अजीब तरीक़े से धोके से हज़रत अली र.अ. की मोहब्बत के परदे में हज़रत मु’आविया र.अ. की दुश्मनी को बुनियाद बनाकर इस फ़िरक़े की बुनियाद डालने का मन्सूबा (योजना) बनाना शुरू कर दिया|

इस फ़िरक़ा के जाहिर होने की खबर रसूलुल्लाहﷺ पहले ही दे चुके थे और उम्मत को ख़बरदार करते हुए फरमाया था जिसका मफहूम ये है के बहुत जलद ही ऐसे लोग पैदा होगे जो मेरे सहाबा र.अ. को बुरा भला कहेंगे और उनमे कमियां निकालेंगे, तो तुम लोग उन्के साथ मेल मिलाप मत रखना और ना उन्के साथ खाना पीना, ना उन्के साथ शादी बियाह करना|

(मुज़ाहिरे हक़ शरहे मिश्कात 283/8)

हज़रत ‘अली र.अ. से रिवायत है के रसूलुल्लाहﷺ ने हज़रत अली र.अ. को मुखाताब करके फरमाया बहुत जलद ही एक जमात पैदा होगी, जिस्को “राफ्जी” कहा जायेगा, तो अगर तुम उनको पाओ तो उनको क़त्ल करना क्यूंके वो मुशरिक होंगे

मैंने अर्ज़ किया या रसुलल्लाह ﷺ! उन्की पहचान क्या हे?

आपने फरमाया के वो तुम्हे (यानी हज़रत ‘अली र.अ.) को बहुत ऊंचा दिखायेंगे, जो बाते तुममे नहीं होगी और सहाबा पर लान-तान (गाली-गलोच) करेंगे|

(दारकुतनी, मुज़ाहिरे हक़)

रसूलुल्लाहﷺ के फरमान के मुताबिक़ ये लोग हज़रत उस्मान र.अ. की ख़िलाफत के ज़माने में जाहिर हुवे और गुप्त तरीके से योजना करके और साज़िशे करके तरक्की करते रहे और आहिस्ता आहिस्ता अपनी जमात बढाते रहे| यहा तक के बहुत जलद ही एक तंज़ीम (संस्था) के रूप में जहिर होकर मुसलिम उम्मत में फितनागिरी शुरू कर दी|

हज़रत उस्मान र.अ. को जब उनकी करतूतो का पता चला तो उन्को डांट डपट की और उन्के सरदार इबने सबा को मदीना से बाहर निकलवा दिया| मदीना से नाउम्मीद होकर उसने कुफा, बसरा, मिसर, वगैरा की तरफ रूख किया और राजधानी से दूर जगाहो पर पहुँच कर अपनी चाले चलनी शरू करदी| और हुकुमत के खिलाफ बग़ावत करदी|

हज़रत उस्मान र.अ. पर तरह तरह के इलज़ाम लगाये, उन्को (नउजुबिल्लाह) लुटेरा, ख़यानत करने वाला बतलाया और उन्के ख़िलाफ धोका और योजना के बड़ा प्रचार करके आपको शहीद कर दिया| ज़रूर देखिए→ रमदान अशराह की दुआ

हज़रत उस्मान र.अ. के बाद हज़रत अली र.अ. के सर पर ख़िलाफत का ताज रखा गया|

मगर उन्ही शिया ने ‘अली कहलाने वाले हज़रत ‘अली र.अ. की झूठी मोहब्बत का दवा करने वालो ने जिन्हे ना तो हज़रत अली र.अ. से कोई मोहब्बत थी और ना ही इस्लाम से कोई हमदर्दी थी| बल्के उनका मक़सद इस्लामी ख़िलाफत की जड़े काटना था|

उन्होने हज़रत अली र.अ. की मुख़ालफत पहले की तरह चालु रखी और शक्ले बदल-बदल कर साज़िशे करते रहे और आखिर में हज़रत अली र.अ. के एक फेस्ले से इख़्तिलाफ करके उन्को भी शहीद कर दिया|

फिर 6 महीने तक वो हज़रत हसन र.अ. के लिये भी दर्दे सर बने रहे और उन्के साथ भी बुरा सुलूक जारी रखा| आपकी पसली में खंजर मारा, आपका माल सामान लूटा, आपकेख़ेमे में आग लगायी और आपके क़त्ल की नापाक कोशिशे भी की|

जिसका सबुत खुद शिया की किताबो में भी मौजुद हे| (एहतेजाज तबरसी में जैद बिन वहब जुहनी की रिवायत है के)

हज़रत हसन र.अ. ने क़सम खाकर फरमाया ख़ुदा की कसम में मुआविया को अपने लिये इन लोगो से ज़्यादा बेहतर समझता हूँ| जो अपने आपको मेरासिया केहते है|

उन्होने मेरे क़त्ल का इरादा किया मेरा माल सामान छीन लिया अल्लाह की क़सम में मुआविया से कोई मुआहदह दस्तावेज कर लूं, जिससे मेरी जान और मेरे रिश्तेदारो की हिफाजत हो जाये, ये बेहतर हे इससे के शिया मुझे क़त्ल कर दे|

(एहतेजाज तबरसी ईरान स.148)

और एक शिया रिवायत के अलफाज हे: “और उनको (हज़रत हसन रदी.) को यहाँ तक परेशान और मजबूर कर दिया के उन्होने हज़रत मुआविया र.अ. से सुलह करली| (जीलाउल उयुन अल्लामा बाकीर मज्लीसी) गर्झे शियो की ज़्यादतियों से परेशान होकर आपने ख़िलाफत हज़रत मुआविया र.अ. के सुपुर्द कर दी|

हज़रत मुआविया र.अ. जिस वक़्त तख़्त नशींन हुए, उस वक़्त मुल्क के सियासी हालात बहुत खराब थे| तरह तरह के फितने पैदा हो रहे थे| शियाओं के फितने की जड़े काफी मज़बूत हो गई थी और वो तरीक़े बदल बदल कर इस्लाम और मुस्लमानो के रास्ते में रोड़े डाल रहे थे|

अगरचे वो खुद अपनी अन्दर की टूट-फूट का शिकार होकर बहुत से हिस्सो में तकसीम हो चुके थे| मगर सबका मक़सद एक ही था और सब इस्लाम से दुश्मनी में बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रहे थे|

ऐसे हालात में नई हुकुमत के लिये जरूरी था के सब्से पेहले बगावत ख़त्म करने के लिये कोई पॉजिटिव और मज़बूत कदम उठाये और फ़सादियों की जड़े काटने के लिये कोई कड़ा और सख़्त कदम उठाये| ज़रूर देखिए→  शबे बरात की इबादत का तरीक़ा

हज़रत मुआविया र.अ. ने हुकुमत पर बेठते ही फितना फेलाने वालो का सर कुचलने का मुहिम पूरे मुल्क में चलाया और बाग़ियों, शियाओं को ढून्ढ-ढूंढ कर क़त्ल करना और सज़ाएं देना शुरू कर दिया| जिस्से बहुत जलद ही शिया आपने अन्जाम को पहुँच गये और कूछ लोग सज़ा या मौत के ख़ौफ़ से अन्डरग्राउड हो गये और अपना मज़हब छुपा के आपनी जान बचाने में अपनी आफीयत समझी|

एक शिया लेखक उस वक़्त के हालत बयान करते हुवे लिखता है, शिया ने हज़रत अली र.अ. के मालो सामान क़ब्ज़े कर लिये गये, वो क़त्ल कर दिये गये और इस कदर ज़ुल्म उनपर किये गये के कोई अपने आपको शिया ना कह सकता था|

(तारीखे इस्लाम स.33,जि.1, ज़ाकिर हुसैन जाफरी शिया).

ये लोग जाहिर में तो खामोश हो गये, मगर हकीकत में उन्के सीनो में दुश्मनी की आग भड़क ही रही थी और वो लोग हुकुमत से छटकारे का बहुत शिद्दत से इन्तेज़ार में थे| तो 10 साल बहुत ही कामयाबी से हुकुमत करने के बाद 22 रज्जब सन 60 हिजरी को मिल्लते इस्लामीया के ये अज़ीम रेहनुमा दुनिया से रूखसत हो गये|

“इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलयही राजि’ऊन”

हज़रत मुआविया र.अ. से ‘हसद करने वालो के लिये इस्से बढकर खुशी की बात और क्या हो सकती थी| के उनका जानी दुश्मन दुनिया में नहीं रहा|

इसलिये उन्होने हज़रत मुआविया र.अ. की वफात की खबर सुनकर बहुत खुशिया मनाई और अपनी खुशी जाहिर करने के लिये मीठी टिकिया (कून्डों की पूरिया) बनाई और एक दुसरे को खिला कर आपने दुश्मनी के जज़्बे को तस्कीन दी और ये सारे काम सुन्नीयो से छुपकर ख़ुफ़िया तरीके से अन्जाम दिये|

टिकिया छुपकर क्यूं बनाई और खाई जाती है?

सवाल पैदा होता हे के ये कारवाई छुपा कर क्यू रखी गई?

और उन्होने वफाते हज़रत मुआविया र.अ. पर अपनी खुशी का ईजहार खुल्लम खुल्ला क्यू नहीं किया?

मौलाना अब्दुल अली फारूकी इसकी वजह लिखते हे “क्यूके उस वक़्त अहले सुन्नत वल जमात की ताक़त ज़ोर पर थी| और वो सहाबीये रसुल ﷺ की तौहीन और उन्की वफात पर खुशी के इजहार को बरदाश्त नहीं कर सकते थे|

इसलिये राफ्जीयो ने छुप छुपा कर आपने आपने घरो में ही टीक्कीया बना ली और उनहें आपस में तकसीम करके गुप्त तरीके से खुशी का ईजहार करके सहाबा से दुश्मनी का सबूत दिया बाद में जब इस बात की चर्चा शुरू हुई तो बहुत ही चतुराई होशयारी से इसको हज़रत इमाम जाफर सादिक की तरफमनसूब कर दिया| ज़रूर देखिए→ सूरह कौसर की तफसीर और फ़ज़ीलत

यही वजह हे के इस रस्म में आज तक इस बात की पाबंदी हे के कून्डों की टिकिया किसी ख़ुफ़िया जगाह पर बनाई जाती हे| फिर बहुत ही एहतेमाम से उन्हें ढक कर रखा जाता हे और फातिहा भी किसी अंधेरी जगाह पर दिलाई जाती है| और फिर परदे के साथ ही उन्हें खाया जाता है|

लेकिन आगे चलकर जब इस साज़िश की ख़बर सुन्नीयो को हुई और छुपे हुवे राज़ पर से परदा उठा तो शिआओ ने अपना जुर्म छुपाने के लिये इस्का रूख ईमाम जाफर सादिक के फातिहा की तरफ मोड़ दिया|

ये हे इस रस्म की असल और हकीकत, जिस्मे अनजाने में बहुत से अनपढ़ और बहुत से अहले सुन्नत भी शरीक हे और इस रस्म को दीन का एक हुक्मम और सवाब का काम समझ कर अन्जाम देते हे और ये नहीं जानते के ये हुब्बे अली के परदे में बुग्ज़े मुआविया का मिसदाक हे|

यानी हज़रत अली र.अ. की मोहब्बत की आड़ में हज़रत मु’आविया र.अ. के साथ दुश्मनी निभा रहे हे| अल्लाह हम सबको सही समझ और तौफीक़ ‘अता फरमाये आमीन|

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कूंडे की नियाज़ दिलवाना कब दिलवानी चाहिए?

हज़रत इमाम जाफर सादिक़ र.अ. की विलादत 15 रबी-उल-अव्वल को हुई| इसीलिए अगर हम चाहे तो इस दिन हज़रत इमाम जाफर सादिक़ र.अ. की रूह को सवाब पहुँचाने की निय्यत से नियाज़ दिलवा सकते है| बजाये इसके के हम 22 रजब को नियाज़ दिलवाएं|

क्योंके रजब की 22 को सहाबी-ए-रसूल हज़रत अमीर मुआ’विया का इन्तिक़ाल हुआ था और 22 रजब को राफ्ज़ी (शिया) अमीर मुआ’विआ के विसाल की ख़ुशी में ईद मानते हैं।

Kunde Ki Niyaz

Rajab un chaar mahino mein se hai jin ko ALLAH ne azmat wale mahine qarar diya hai. Kunde ki Niyaz ke bare mein badqismati se kuch logo ne iski azmat ko bhula kar kuch aisi rasmein bana dali hai jinka islam se dur-dur ka bhi koyi lena dena nahi hai. Inhi rasmon mein se ek rasm “kunde ki rasm” bhi hai. Jo is mahine ki 22 tareekh ko manayi jati hai.

Is post mein ham parhenge:

Is rasm ki haqikat kya hai?

Iski shuruwat kab aur kyun hoyi?

Iski badi tafseel hai jiske pichhe Hazrat Muawiya R.A ki dushmani ki ek ajib tareekh chhupi huyi hai jise samajhne ke liye tareekh(itihaas) samajhna zaruri hai.

Rasool ALLAH ﷺ ki peshanguyi (kisi chiz ka uske hone se bayan kar dene ke baad fitnon ki shuruwat ho gayi thi. Ek tarha jhuthi nabuwwat ke dawedaar khade ho gaye, dusri tarha zakaat ka inkar karne wale ka fitna samne aa gaya, teesri taraf munafiqon ne apne par failane shuru kar diye aur chauthi yahudiyon aur isayi ne apni islam se dushmani ki koshish tez kar di garz ke islam charon taraf se fitnon ke gherein mein aa gaya aur musalmanon ke dushman islam ko mitane ke liye taiyar ho gaye. Zarur dekhiye→ Ya Zal Jalali Wal Ikram

Isi darmiyan shiya firka paida ho gaya, jiska banane wala “Abdullah ibne Saba” Yamny tha, jo yahudi mazhab ko manne wale tha aur islam aur musalmanon ka bada dushman tha.

Usne bahut ajib tarike se ghuke se Hazrat Ali R.A ki muhabbat ke parde mein Hazrat Muawiya R.A. ki dushmani ko buniyadi banakar is firke ke zahir hone ki khabar Rasool ALLAH ﷺ pehle hi de chuke the aur ummat ko khabardaar karte huye farmaya tha bahut jald hi aise log paida honge jo mere sahaba R.A. ko bura bhala kahenge aur unmein kamiya nikaloge, Tu tum log unke sath khana pina, na unke sath shadi biyah karna.

(Muzaahir Haq Sharhe Mishkaat 283/8)

Hazrat Ali R.A. se riwayat hai ke rasool ALLAH ﷺ ne hazrat Ali R.A. ko mukhatab karke farmaya

bahut jald hi ek jamaat paida hogi, jisko “Rafiji” Kaha jayega, to agar tum unko katal karna kyun ke mushriq honge maine arz kiya ya Rasool ALLAH ﷺ! Unki pehchan kya hai?

Aapne farmaya ke wo tumhe (yani Hazrat Ali R.A.) ko bahut ooncha dikhayenge, jo batein tumme nahi hongi aur sahaba par laal-taan(gali-galoch) karenge.

(Darkutani, Muzahir-e-Haq)

Rasool ALLAH ﷺ ke farmaan ke mutabiq yeh log Hazrat Usman R.A. kisi khilafat ke zamane mein zahir huye aur gupt tarike se yujna karke aur sajishen karke tarakki karte rahein aur ahistah-ahishta apni jamaat badhate rahein. Yahan tak ke bahut jald hi ek tanzeem (sasntha) ke roop mein zahir ho kar muslim ummat mein fitnagiri shuru kardi Hazrat Usman R.A. ko jab unke kartuton ka pata chala to unko dant dapat ki aur unke sardar ibne Saba ko madine se bahar nikalwa diya.

Madina se naummid hokar usne koofa, basra, misr wagairah ki taraf rukh kiya aur rajdhani se dur jagahon par puhuch kar apni chaalen chalni shuru kardi aur hukumat ke khilaaf bagawat kardi.

Hazrat Usman R.A. par tarha tarha ke ilzaam lagaye, unko (nau’zubillah) lutera, khayanat karne wala batlaya aur unhe khilaaf dhoka aur yujna ke bada prachar karke Aapko shaheed kar diya.

Hazrat Usman R.A. ke baad Hazrat Ali R.A. ke sat par khilafat ka taaj rakha gaya, magar unhi shiya ne Ali kehlane wale Hazrat Ali R.A. ki jhuthi muhabbat thi aur na hi islam se koyi hamdardi thi.

Balke unka maqsad islami khilafat ki jaden khodna tha, unhone Hazrat Ali R.A. ki mukhalfat pehle ki tarha chalu rakhi aur shaklen badal badal kar sajishe karte rahe aur akhir mein Hazrat Ali R.A. ke ek faisle se ikhtilaaf karke unhe bhi shaheed kar diya.

Phir 6 mahine baad tak Hazrat Hassan R.A. ke liye bhi darde sar bane rahe aur unhe sath bhi bura suluk jari rakha, Aapki pasli mein khanjar mara, Aapka maal saman luta, Aapke khemen mein aag lagayi aur Aapke katal ki napaak koshish bhi ki, jiska sabut khud shiya ki kitabon mein bhi maujood hai.

(Yehtejaj tabarsi mein Zaid bin Wahab Juhani ki riwayat hai ke) Hazrat Hasan R.A. ne kasam khakar farmaya khuda ki kasam mein muawiya ko apne liye in logo se ziada bahter samajhta hun, jo apne Aapko merasiya kehte hai, unhone mere qatl ka irada kiya mera maal saman chheen liya ALLAH ki kasam mai muawiya se koyi muahdah dastawez karlun, jisse meri jaan aur mere rishtedaron ki hifazat ho jaye, yeh bahter hai isse ke shiya mujhe katal kar de.

(Ehtejaj Tabarsi Iran S. 148)

Aur ek shia riwayat ke alfaaz hai:

“Aur unhe (Hazrat Hasan R.A.) ko yaha tak pareshan aur majbur kar diya ke unhone Hazrat Muawiya R.A. se sulah karli. (Jilaul Yunus Allama Bakeer Majlisi) garjhe ki ziyadtiyon se pareshan ho kar apne khilafat Hazrat Muawiya R.A. ko saunp di.

Hazrat Mu’awiya R.A. jis waqt takht nasheen huye, us waqt mulk ke siyasi halaat bahut kharaab the. Tarha tarha ke fitne janm le rahe the, shia ke fitne ki jade kafi mazbut ho gayi thi aur wo tarike badal badal kar islam aur musalmanon ke raste mein roden daal rahe the.

Agarche wo khud apni andar ki tut-fut ka shukar ho kar bahut se hisse mein takseem ho chuke the. Magar sabka maqsad ek hi tha aur sab islam se dushmani mein badh chadh kar hissa le rahein the. Aise halat mein nayi hukumat ke liye zaruri tha ke sabse pehle bagawat khatam karne ke liye koyi positive aur majbut kadam uthaye aur phasadiyon ki jade katne ke liye koyi kada aur sakht kadam uthaye! Zarur dekhiye→ Ilm Mein Izafa Ki Dua

Hazrat Mu’awiya R.A. ne hukumat par baithte hi fitna failane walo ka sar kuchalne ka muhim pure mulk mein chalaya aur baghiyon.

Shia ko dhund dhund kar qatl karna aur sazayen dena shuru kar diya. Jisse bahut jald hi shia apne anjaam ko puhuch gaye aur kuch log saza ya maut ke khauf se underground ho gaye aur apna mazhab chhupa ke apni jaan bachane mein apni aafiyat samjhi.

Shia ne Hazrat Ali R.A. ke maal-o-samaan qabze kar liye. Wo qatl kar diye gaye aur is qadar zulm unpar kiye gaye ke koyi apne apko shia na kah sakta tha!

Tareeke Islam S.33, Ji.1, Zakir Hussain Jafri Shia

Ye log zahir mein to khamosh ho gaye. Magar haqikat mein unhe seeno mein dushmani ki aag bhadak hi rahi thi aur wo log hukumat se chhutkare ka bahut shiddat se intezar mein the to 10 saal bahut hi kamyabi se hukumat karne ke baad 22 rajjab San 60 hijri ko milte islamiya ke ye azeem rehnuma duniya se rukhsat ho gaye.

“Inna lillahi wa inna ilaihi raji’oon”

Hazrat Mu’awiya R.A. se hasad karne wale ke liye isse badhkar khushi ki baat aur kya ho sakti thi. ke unka jani dushman mein nahi raha. isliye unhone Hazrat Muawiya R.A. ki wafat ki khabar sunkar bahut khushiyan manayi aur apni khushi zahir karne ke liye mithi tikiya (kunde ki puriya) banayi aur ek dusre ko khali kar apne dushmani ke jazbe ko taskeen di aur yeh sare kaam sunniyon se chhup kar gupt tarike se anjam diya!

Tikiya Chhupkar Kyu Banayi Aur Khayi Jati Hai?

Sawal ye paida hota hai ye karwayi chhupa kar kyu rakhi gayi?

Aur unhone wafate Hazrat Muawiya R.A par apni khushi ka izhar khullam khulla kyu nahi kiya?

Maulana Abdul Ali Faruqi iski wajah likhte hai “kyuki us waqt ahle sunnat wal jamat ka takat jur par tha aur wo sahabiye Rasool ki tauheen aur unki wafaat par khushi ke izhar ko bardaasht nahi kar sakte the.

Isliye rafjiyun ne chhup chhupa kar apne apne gharon mein hi tikkiye bana li aur unhe apas mein takseem karke gupt tarike se khushi ka izhaar karke sahaba sedushmani ka sabut diya baad mein jab is baat ki chahcha shuru huyi to bahut hi chaturayi hoshyari se isko Hazrat Imam Zafar Sadiq ki taraf mansub kar diya. Zarur dekhiye→ Isale Sawab Ka Tariqa Aur Fazilat

Yahi wajah hai ke is rasm mein aaj tak is bat ki pabandi hai ke ku de ki tikkiya kisi khufya jagah par banayi jati hai. Phir bahut hi ehtemam se unhe dhak kar rakha jata hai. Is par fatiha bhi kisi andheri jagah par dilayi jati hai. Aur phir parde ke sath hi unhe khaya jata hai.

Lekin aage chalkar jab is sazish ki khabar sunniyu ko huyi aur chhupe huye raaz par se parda utha to shiao ne apna jurm chhupane ke liye iska rukh Imam Zafar Sadiq ke fatiha ki taraf mod diya.

Niyaz Dilwana Kab Dilawani Chahiye?

Hazrat Imam Jafar Sadiq R.A. ki wiladat 15 Rabi-ul-Awwal ko hui. Ham chahe to is din inki rooh ko sawab pahunchane ki niyyat se niyaz dilwa sakte hai. Bajaye iske ke 22 Rajab ko niyaz dilwaye kyonke is din sahabi-e-Rasool ﷺ Hazrat Ameer Mu’awiya ka inteqal hua aur rafijiyon (shiaon) ne khushi manayi thi.

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15 Comments

  1. Bushra on said:

    Aslm .bhai mere upar black magic karke mere sasural waale mere se nikha karliye. Sirf paison k liye .Ab zabardasti qula maangrahe hai ..coz unka plan flop hogaya .paise nahi mil rahe hai isliye .bhai me qula Dena ya nai isliye istekhara karna chahti hoon .Kon sa istekhara karun?

  2. Faiza on said:

    Aslm bhai .bhai me apne shohar k liye surah Al Ahzab wala wazifa kar rahi hoon .wo mujhse bila waja qula mang rahe hai.apke youtube is ya wadoodu wazifa karna chahti hoon .toh surah Al Ahzab wazifa continue karun ya stop .ya wadoodo wazifa ka condition hai ke dusre love wazifa stop karne.plz rply kare

  3. Doctorrizvi on said:

    Bhai mera sawal hai k jo buzug log hote the unki ibadaat ko apnana kesa hai in islam jazakillah

    • ALLAH ki ibadat kisi bhi sahi tarqe se karna bahot hi achha hai.

  4. Neera on said:

    Salam. I want to do the sugar and ants wazifa but I am traveling so is it okay to put sugar in different places or does it have to be in one place?

    • Yes it is totally fine

  5. Fariha Rizvi on said:

    Bhaimera sawal zara mukhtalif hai me bht preshan hu aur confuse hu k kya jo buzurg log krte the aamal jese 24 rakat nawafil ada karna aur kya unko sawab hadya pohunchana jaiz hai …mjhe janna hai k ye khin bidat aur shirk me se to nahi hai … aur dusra masla ye tha k jo Allah ke namon ka jo wird kia jata hai jese ya wakilo ya wadudo jesa akela nam to kya ye wird krna jaiz hai ..? Allah ke rasool (saw) ne to ni kia aisa kch kbhi ap pls madad kre ise jazakillah

    • Meri behen Ap nifl parhkar buzurgo ki maghfirat aur bakhshish ke liye dua kar sakti hai. ALLAH ke naam ka wird karne se bahot fazilat hai. Isme koi manayi nahi.

  6. Samar on said:

    Thank u for this post!

  7. Sumbal Begum on said:

    I don’t understand hindi above everything in hindi

    • we will post this in English

  8. Arona Yade on said:

    why you send me posts in Indian????? I speak English or french…..please respect my needs…Thank you

    • we are working on it brother

Apne sawal yahan puchiye!