Aqeeqah Karne Ki Dua Aur Tariqa

October 24th, 2022

Aqiqa ke bare me Hadees aur aqeeqah karne ki dua aur iska tariqa hadees me. Ladki ke aqiqah ki dua aur ladki ke liye. Kitne bakre ya bakri honi chahiye tamam jankari is post mein Quran-o-Hadees ki roshni mein parhiye.

Aqiqah Karne Ki Dua Aur Tariqa | अक़ीक़ा करने की दुआ और तरीक़ा

इस दुनिया में अल्लाह ने इंसान को पैदा करने के साथ ही एक से बढ़कर नेअमतें अता कीं हैं, जैसे माल, औलाद, वगैरा लेकिन इन तमाम नेअमतों में औलाद की नेअमत बहुत बड़ी है, तो अगर अल्लाह ने आप को औलाद जैसी नेअमत अता की, तो सातवें दिन उसका नाम रखें और अक़ीक़ा करें|

Contents

अक़ीक़ाह क्या होता है?

अक़ीक़ाह (Aqeeqah) उस ज़बीहा को कहते हैं जो नौमोलुद की तरफ से किया जाता है।

यह भी कहा गया है कि अक़ीका (Aqeeqah Karne Ki Dua) उन बालों को कहा जाता है जो मां के पेट में पैदा होने वाले बच्चे के सर में निकलते हैं।

चूंकि उन बालों को नौमोलूद के सर से जिबह के वक्त मुंड दिया जाता है। इसलिए किसी बच्चे की पैदाइश पर जो बकरी ज़िबह की जाती है, उसे अकीका कहा जाता है।

‘अक़’ का एक म’आनी फाड़ना और काटना भी होता है। इसलिए भी नौमोलूद की तरफ से जिबह की जाने वाली बकरी को अक़ीक़ाह कहा गया क्योंकि उस (जानवर) के जिस्म के टुकड़े कर दिये जाते हैं और उसके पेट को चीर-फाड़ दिया जाता है।

बलू गुल मराम जिल्द 2 सफाह 873

यहाँ देखिये→ सूरह यासीन हिंदी में

अक़ीक़े (Aqeeqe) की अहमियत

इरशादे बारी तआला है “अल्लाह का शुक्र अदा करो। अगर तुम सिर्फ उसी की ‘इबादत करते हो।”

सूरह नहल आयत न. 114

“तुम मेरा ज़िक्र करो। मैं भी तुम्हें याद करूंगा और मेरी शुक्र गुज़ारी करो और ना शुक्री करने से बचो।”

बक़राह आयत न. 152

इसलिए औलाद जैसी नेमत के मिलने पर अकीका करके अल्लाह का शुक्र अदा करना चाहिये।

अकीके का गोश्त खुद भी खाया जा सकता है। दोस्तों को भी दिया और खिलाया जा सकता है। गरीबो-मिस्कीनों और रिश्तेदारों को पका कर भी खिलाया जा सकता है।

यहाँ देखिये→सूरह इन्शिक़ाक़ हिंदी में

हदीस की रोशनी में अक़ीक़ाह (Aqeeqah)

Aqeeqah Karne Ki Dua Aur Tariqa

(1) “बच्चे के साथ अक़ीक़ाह (लाजिम) है। लिहाजा तुम उसकी तरफ से कुर्बानी करो और उसकी तकलीफ को दूर करो।”

रावी-सलमान बिन आमिर रज़ि-बुखारी-5472, अबु दाउद-2839, इब्ने माजा-3184,नसाई-4220,तिर्मिज़ी-1361,दारमी-2012

(2) “जिसके यहां कोई बच्चा पैदा हो और वह उसकी तरफ से कुर्बानी करना चाहे तो ज़रूर कुर्बानी करे।”

अब्दुल्लाह बिन अम्र रजि-नसाई 4218

(3) “हर बच्चा अपने अकीके के एवज़ गिरवी होता है। पैदाइश के सातवे दिन उसका अक़ीक़ाह किया जाए।”

रावी-सुमरा बिन जुन्दुब रज़ि- अबुदाउद-2838, नसाई-4226. इब्ने माज़ा-3165, तिर्मिजी-1368, दारमी-2014

(4) “लड़के की तरफ से दो बराबर (एक जैसी) बकरियां और लड़की की तरफ से एक बकरी।”

कुर्बानी की जाए।

रावीया-उम्मै कुर्ज कअबिया रज़ि-अबुदाउद-2834, नसाई-4221, इने माजा-3162, दारमी-2011

(5) “आप (ﷺ) ने हसन रज़ि और हुसैन रज़ि का अकीका किया और 2-2 दुम्बे जिबह किये।”

रावी-इने अब्बास रज़ि-नसाई-4225

(6) “हमें अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने हुक्म दिया कि लड़के की तरफ से दो बकरियां और लड़की की तरफ से एक बकरी अक़ीके में कुर्बानी की जाए।”

आएशा रज़ि-इब्ने माजाह-2163, तिर्मिजी-1359

(7) “आप (ﷺ) ने हसन रज़ि की तरफ से अक़ीका किया। फिर फरमाया ऐ फातिमा (रजि) इस का सर मुन्डवाओ और इस के बालो के वज़न के बराबर चांदी सदका करो।”

अली रज़ि-तिर्मिजी-1365

(8) “फातिमा रज़ि ने हसन रज़ि और हुसैन रज़ि के बाल तौल कर उन के वज़न के बराबर चांदी सदका की।”

मुवत्ता इमाम मालिक-1121 सफाह-371

(9) “अक़ीक़ाह किया जाए बच्चे की तरफ से लेकिन उस के सर में खून (अकीके के जानवर का जैसा कि जमाना ए जाहिलियत में रिवाज़ था) ना लगाया जाए।”

यज़ीद बिन अब्द-इब्ने माजाह-3166

यहाँ देखिये→ सुबह उठने की दुआ हिंदी में

मालूम हुआ अकीका इस्लाम की सुन्नतों में से एक सुन्नत है।

आम अहले इल्म खुसुसन इने अब्बास रजि, इब्ने उमर रज़ि, आएशा रज़ि, फुक्हा ए ताबईन रह, और कई अइम्मा जिनमें इमाम मालिक रह. इमाम शाफई रह.. इमाम अहमद बिन हम्बल रह, और अल्लामा शौकानी रह शामिल हैं, के नज़दीक अकीका सुन्नत है।

बा’अज़ उलेमा ने इसे वाजिब कहा है। जबकि अहनाफ के नजदीक अकीका सुन्नत नही बल्कि सिर्फ मुबाह और जाइज़ है।

शैख इन्ने जबरीन के नज़दीक अकीका सुन्नते मुअक्केदा है। शैख़ इन असीगीन रह ने भी अक्सर अहले इल्म के नज़दीक इसे सुन्नते मुअक्केदा ही कहा। अलबत्ता हसन बसरी रह, के नज़दीक अक़ीक़ाह करना फर्ज है।

फिक्ह उल हदीस-जिल्द 2 सफा 487-488

अगर अक़ीक़ाह (Aqeeqah) करने की हैसियत न हो?

अल्लाह तआला ने फरमाया “अपनी ताक़त भर अल्लाह से डरते रहो।”

सूरह तग़ाबुन, आयत न. 16

“अल्लाह किसी नफ्स को उसकी ताकत से ज्यादा तकलीफ (आज़माइश) नहीं देता।”

सूरह बक़रह न. 285

नबी सल्ल, ने फरमाया “जब मैं तुम्हें किसी काम का हुक्म दूं तो जितनी तुम में ताकत हो, उस पर अमल करो।”

मुस्लिम, नसाई

शैख़ इब्ने असीमीन रह, ने कहा “अगर कोई शख्स अपनी औलाद की पैदाइश के वक्त गरीब हो तो उस पर अकीका करना ज़रूरी नहीं है क्योंकि वह आजिज है और आजिज या बेबस होने की वजह से इबादत साक़ित हो जाती है।”

फतावा इस्लामिया -जिल्द 2 सफाह-427

इमाम अहमद और इमाम मन्ज़र रह ने कहा कि “ऐसा शख्स अकीका करने के लिये कर्ज़ ले ले। उम्मीद है कि अल्लाह उसे सुन्नत ज़िन्दा करने की वजह से पूरा पूरा अज्र दे।”

फिकह उल हदीस-जिल्द 2 सफा-488

क्या बच्चा माँ-बाप का अक़ीक़ह (Aqeeqah) कर सकता है?

जी हाँ, अगर वाल्दैन का अक़ीक़ह उनके बचपन में न हो पाया हो तो उनके बच्चे भी उनका अक़ीक़ह कर सकते है।

नातमाम बच्चे की तरफ से अक़ीक़ाह (Aqeeqah) का हुक्म

साकित हो  गिर) जाने वाले बच्चे की तरफ से अकीका नही हैं।

अगर यह भी पता चल जाये कि वह लड़का है या लड़की। बशर्ते कि रूह फूंके जाने से पहले साकित हो जाए क्योंकि अक़ीक़ाह का जानवर पैदाइश के सातवें रोज़ ज़िबह किया जाता है।

इसी तरह वक्त से पहले गिर जाने वाले नातमाम बच्चो का अक़ीक़ा नहीं है।

सऊदी इफ्ता कमेटी-फतावा इस्लामिया जिल्द 2 सफा 427

यहाँ देखिये→दूध पीने की दुआ

मय्यत की तरफ से अक़ीक़ाह (Aqeeqah)

कुछ उलेमा की राय में ऐसा किया जा सकता है। बशर्ते कि बच्चा सात दिनों से ज्यादा कितनी भी उम्र पा कर फौत हुआ हो। लेकिन शेख इब्ने असीगीन रह. का फत्वा है कि “मय्यत की तरफ से अकीका नहीं है बल्कि उसके लिए मगफिरत की दुआ की जा सकती है और सदका वगैरह किया जा सकता है।” (फतावा इस्लामिया जिल्द 2 सफा 425)

ज़िन्दा वालदैन की तरफ से अक़ीक़ाह (Aqeeqah)

अल्लाह के रसूल सल्ल. के इस फरमान कि “हर बच्चा अपने अकीके के एवज़ रहन (गिरवी) होता है।” से मालुम होता है कि वालिदैन की तरफ से (अगर उनका अकीका ना किया गया हो) तो औलाद भी उनकी तरफ से अकीका कर सकती है क्योंकि रहन की चीज़) कोई भी छुड़ा सकता है। (फिक्ह उल हदीस-जिल्द 2 सफा-496)

क्या इन्सान खुद अपना अक़ीक़ाह (Aqeeqah) कर सकता है?

अगर किसी के वालिदैन अक़ीके के मसाइल से लाइल्मी, जहालत, गुरबत या किसी और वजह से अकीका न कर सकें हों तो वह खुद भी अपना अकीका कर सकता है।

इमाम शाफ़ई रह, अता बिन अबि रवाह रह. और हसन बसरी रह. का कहना है कि “इंसान अपनी तरफ से भी अकीका कर सकता है इसलिए कि वह अकीके के एवज गिरवी है।” लेकिन हनाबेला(हम्बली) इसके खिलाफ हैं। उनकी दलील यह है कि “अकीका करना वालिदेन की जिम्मेदारी है। (फिक्ह उल हदीस-जिल्द 2 सफा-495)

अगर कोई सातवें दिन से पहले अक़ीक़ा (Aqeeqah) करे

तो ऐसा शख्स सुन्नते रसूल (ﷺ) की खिलाफ वर्जी करने वाला है। क्योंकि नबी (ﷺ) ने अकीके के लिये जो दिन मुकर्रर फरमाया है, वह पैदाइश का सातवां दिन है। लेकिन बच्चा रहन से आजाद हो जाएगा।

फिक्ह उल हदीस-जिल्द 2 सफाह-494

क्या सातवें रोज़ के बाद अक़ीक़ाह (Aqeeqah) किया जा सकता है?

पैदाइश के सातवें रोज के बाद भी अकीका किया जा सकता है। फिर चाहे वह बालिग ही क्यो न हो गया हो। क्योंकि वह बच्चा अकीका न होने की वजह से अभी तक गिरवी है।

जी हाँ, सातवे दिन ही अक़ीक़ह करना सुन्नत है, फरमान-ए-नबी है:

रसूल अल्लाह ﷺ ने फरमाया:

“हर लड़का अपने अक़ीक़ेह के बदले गिरवी रखा हुआ है, इसलिए उसकी तरफ से सातवे (7) दिन क़ुरबानी की जाये और उसका नाम रखा जाये”।

सुनन अबू दावूद, हदीस न. 1065 -साहीहा

यहाँ देखिये→अस्तग़फार की दुआ हदीस में

क्या बच्चे का सर मुंडवाना चाहिए?

समरह ने बयान किया के रसूल अल्लाह ﷺ ने फरमाया:

” लड़का उसके अक़ीक़ेह पर गिरवी है, इस के लिए सातवे दिन ज़िबाह किया जाये, उस का नाम रखा जाये और उस का सर मुंडवाया जाये”

जामी’अ अत-तिर्मिज़ी, न. 1522

बच्चे के गिरवी होने का मतलब?

बच्चे के गिरवी होने का मतलब इमाम अहमद रह. की राय में यह है कि बच्चे का अगर अकीका न किया जाए तो वह अपने मां-बाप की सिफारिश न कर सकेगा।

यह भी कहा गया है कि यह अकीके के वाजिब होने के मफ़हूम में है। जैसा कि कर्ज में अदायगी किये बगैर गिरवी चीज़ वापिस नही हो सकती और यह भी कहा गया है कि बच्चा अपने बालों और मैल-कुचैल के साथ गिरवी होता है यानि उस गिरवी को छुड़ाना चाहिये।”

ऊन अल मअबूद-बहवाला-अबुदाउद जिल्द 3 सफाह 289

रसूल अल्लाह ﷺ ने फरमाया:

“हर लड़का अपने अक़ीक़ेह के बदले गिरवी रखा हुआ है, इसलिए उसकी तरफ से सातवे (7) दिन क़ुरबानी की जाये और उसका नाम रखा जाये”।

सुनन अबू दावूद, हदीस न. 1065 -साहीहा

इसी तरह सउदी मजलिसे इफ्ता का फत्वा है “सातवें रोज के बाद भी अकीका किया जा सकता है लेकिन देर करना सुन्नत के खिलाफ है।”

फतावा इस्लामियां-जिल्द 2 सफाह-426

अक़ीक़े (Aqeeqe) के जानवर में कुर्बानी के जानवर की शर्त?

इस बाबत भी उलेमा हजरात की मुखतलिफ राय हैं। शोकानी रह, कहते हैं कि अकीके के जानवर में चोह शर्ते नही लगाई जाएंगी जो कुर्बानी के जानवर की हैं और यही बात हक है।

नैलुल अवतार जिल्द 3 सफाह-506

अब्दुर्रहमान मुबारकपुरी रह. का कहना है “किसी भी सही हदीस से यह शर्ते लगाना साबित नहीं। बल्कि किसी जईफ हदीस से भी यह साबित नहीं।”

तोहफा अल अहूजी-जिल्द 5 सफाह-399 व हवाला-फिक्ह उल हदीस-जिल्द 2 सफाह-493

अलबत्ता इब्ने कदामा रह. की राय में “अकीके के जानवर में भी उन ऐबों से बचा जायेगा जिनसे कुर्बानी के जानवर में बचा जाता है।”

अल मुगनी जिल्द-13 सफा-999) ब हवाला-फिकह उल हदीस जिल्द-2 सफा-493

यहाँ देखिये→ज़िना से बचने की दुआ

अक़ीक़े (Aqeeqeh) का जानवर नर हो या मादा?

अकीके में नर या मादा दोनो ही जानवर जिबह किये जा सकते हैं। इसलिए कि आप सल्ल. का इर्शाद है “लड़के की तरफ से दो बकरियां और लड़की की तरफ से एक बकरी जिबह की जाए। नर हों या मादा तुम्हें कोई चीज नुकसान नही देगी।” (उम्मे कुर्ज कअबिया रजि. अबु दाउद-2835, तिर्मिजी-1360)

क्या अक़ीक़े में ऊँट और गाय की क़ुर्बानी सही है?

अहादीसे रसूल सल्ल. मे अकीके में कुर्बानी के लिए जिन जानवरों का जिक्र मिलता है, वोह बकरी और दुंबा है। जैसा कि उम्मे कुर्ज रजि. से अबु दाउद (2835) इब्ने अब्बास रज़ि से सुनन नसाई-4222 और अग्न बिन शोएब रजि. से अबू दाऊद में 2842 हदीस में है कि आप सल्ल. ने फरमाया “जिसके यहां कोई बच्चा पैदा हो और वह उसकी तरफ से कुर्बानी करना चाहे तो लड़के की तरफ से 2 और लड़की की तरफ से 1 बकरी कुर्बानी करे।”

“हसन रज़ि और हुसैन रजि, के अक़ीक़े में मेंढा जिबह हुआ।”

अबु दाउद 2841-इब्ने अब्बास रजि.

शोकानी रह. ने लिखा है कि “जम्हूर (उलैमा) गाय और बकरी को (अक़ीके के लिए) काफी करार देते हैं। यानि जाइज़ करार देते हैं।”

नैलुल अवतार जिल्द 3 सफाह-537

डाक्टर वहबा ज़हीली की राय में अकीका भी कुर्बानी की तरह अनआम यानि ऊंट, गाय, भेड़ और बकरी से किया जा सकता है। जिन उलेमा ने ऊंट और गाय की कुर्बानी को अक़ीके के लिए जाइज़ कहा है, उन की दलील अनस रज़ि, से मरवी यह हदीस है “बच्चे की तरफ से ऊंट, गाय, भेड़ और बकरी से अकीका किया जा सकता है। लेकिन यह रिवायत साबित नहीं।”

जैसा कि इमाम हैशमी रह. ने कहा कि इस की सनद में मसअदा बिन अल यसआ रावी झूठा है। चूंकि सही अहादीस में सिर्फ बकरी और दुंबा जिबह करने का ज़िक्र है, इसलिए इन्हीं की कुर्बानी करना बेहतर है।”

फिक्ह उल हदीस-जिल्द 2 सफा-491

यहाँ देखिये→कूंडे की नियाज़ लगाना सही है?

क्या लड़के की तरफ से एक जानवर भी क़ुर्बान किया जा सकता है?

(1) इब्ने अब्बास रज़ि से रिवायत है कि “अल्लाह के रसूल सल्ल ने हसन रज़ि, और हुसैन रज़ि, की तरफ से अकीके में 1-1 दुम्बा जिव्ह किया।” (अबु दाउद-2841)

शैख़ अल बानी रह. ने कहा कि यह रिवायत सही है लेकिन नसाई की वह रिवायत ज्यादा सही है जिसमें 2-2 का जिक्र है।

नसाई-4225-इल्ने अब्बास रजि.

(2) इब्ने उमर रज़ि, अपने घर वालों की तरफ से अकीके में (लड़का हो या लड़की) 1-1 बकरी जिबह करते थे।

मुवत्ता इमाम मालिक-1122 सफाह-371

(3) उरवाह बिन जुबैर रज़ि. अपनी औलाद की तरफ से लड़का होता या लड़की 1-1 बकरी अकीके में जिबह करते थे।

मुवत्ता इमाम मालिक हदीस 1125 सफाह-371

शोकानी रह ने कहा कि आप सल्ल. का अकीके में एक बकरी कुर्बान करना इस बात का सुबूत है कि दो जानवर जरूरी नहीं बल्कि मुस्तहब हैं।

फिक्ह उल हदीस-जिल्द 2 सफाह-493

चूंकि कौल को फैअल पर तरजीह होती है। इसलिए लड़के की तरफ से 2 और लड़की की तरफ से 1 जानवर ही जिबह करना बेहतर है।

अक़ीक़ाह (Aqeeqah) के जानवर का गोश्त और खाल का मसरफ

इस बारे में अहादीसे रसूल सल्ल. से कोई रहनुगाई नही मिलती। अलबत्ता डॉक्टर वहबा ज़हीली का कहना है कि अकीके के (जानवर के) गोश्त और खाल का हुक्म कुर्बानियों की तरह ही है। यानि उनका गोश्त खाया जा सकता है, खिलाया जा सकता है और उस से सदका किया जा सकता है लेकिन उस की कोई चीज बेची नहीं जा सकती। (फिकह उल इस्लामी व अदल्ला जिल्द 3 सफा 639 व हवाला फिक्ह उल हदीस जिल्द 2 सफा 496)

अक़ीक़े (Aqeeqe) के बदले जानवर की कीमत सदका कर देना कैसा है?

इब्ने कदामा रह, ने कहा “अक़ीके के जानवर की कीमत सदका करने से अक़ीके के जानवर को जिबह करना ज्यादा अफजल है।”

इमाम अहमद रह, ने कहा कि “जब किसी के पास इतना माल न हो कि वह अकीका कर सके तो कर्ज ले ले क्योंकि यह ऐसा ज़बीहा है जिसका नबी सल्ल. ने हुक्म दिया है।”

फिक्ह उल हदीस जिल्द 2 सफाह 495

अक़ीक़े (Aqeeqe) के जानवर की कीमत किसी फंड में जमा कराना कैसा?

अक़ीक़े का बदल नहीं होगा। बुरैदाह रज़ि, का बयान है कि दौरे जाहिलियत में जब हम में से किसी के यहां बच्चा पैदा होता तो वह एक बकरी जिबह करता और उस का खुन बच्चे के सर पर चुपड़ देता था। मगर जब से अल्लाह ने हमें इस्लाम की दौलत से नवाज़ा है, हम एक बकरी जिबह करते हैं, बच्चे का सर मुँडाते हैं और उस के सर पर जाफरान मल देते हैं। (अबुदाऊद-2843)

अक़ीके (Aqeeqe) का इरादा न हो तो पैदाइश के दिन नाम रखना कैसा?

अगर बच्चे के अक़ीके का इरादा न हो तो पैदाइश के दिन ही उसका नाम रखना जाइज़ है। इसलिए कि अबु मूसा रजि. के यहां जब बच्चा पैदा हुआ तो आप उसे लेकर नबी सल्ल. के पास गये। आप सल्ल. ने बच्चे का नाम इब्राहीम रखा और खजूर को दांतों से चबाकर उसे चटाया। (बुखारी-5447)

ऐसा ही आप सल्ल. ने अब्दुल्लाह इने जुबैर रजि. की पैदाइश पर भी किया था।

सहीह अल-बुखारी-5489

अल्लाह तआला से दुआ है कि वह हमें सुन्नत के मुताबिक ज़िन्दगी गुजारने और बिदआत और फिजूल रूसूमात से दूर रहने की तौफीक अता करे। अमीन।अहले इल्म हजरात से गुजारिश है कि इस पर्व में कहीं कमी या गल्ती पायें तो जरूर हमारी इस्लाह फरमाऐ।

यहाँ देखिये→नाख़ून काटने का सुन्नत तरीक़ा

अक़ीक़ा करने की दुआ

Kya Aqeeqah Karne Ki Dua Hai?

क्या वाक़ई अक़ीक़ाह की दुआ है?

आगे हम अक़ीक़ाह के बारे में हदीस और क़ुरआन के हवाले से जानेंगे| साथ ही अक़ीक़े से जुड़े कुछ सवालों के जवाब भी आप पढ़ेंगे ये वो सवाल होते है जो इससे जुड़े मसाइल होते है जिनके बारे में हमें आसानी से मालूम नहीं हो पता है| ये आम तौर से लोगों के ज़हनों में होते हैं|

इन्हें जाने के बाद इंशा अल्लाह आप अपने बच्चों का सही तरीक़े से यानी जो सुन्नत तरीक़ा है वैसे ही अक़ीक़ाह कर पाएंगे| जिसकी वजह से आपकी औलाद बालाओं से महफूज़ रहेगी और ये आप लोगों के लिए सवाब का सबब बनेगा|

यूं तो अक़ीक़ाह की दुआ आपको इन्टरनेट पर हर किसी वेब साईट पर देखने पढ़ने को मिल जाएगी| लेकिन इन्टरनेट से हदीस की दुआएं बिला सही हवाले यूँही हासिल कर गुनाह का सबब भी बन सकता है| जिसे हम हदीस समझ कर अमल में ले रहें हो वो हो सकता है के हदीस न भी हो|

ये जानना बहोत ज़रूरी है के इसका हवाला सही भी है या नहीं? क्या ये दुआ हमें पढ़नी भी चाहिए या नहीं?

अक़ीक़ाह करने की दुआ के बारे में ये जान लेना बेहद ज़रूरी है के ये दुआ जो आपको इन्टरनेट पर हज़रात आयशा रज़ि. के हवाले से न जाने कितनी वेबसाइट्स पर पढ़ने को मिल रही है|

अक़ीक़ाह करने की ये दुआ किसी भी सहीह हदीस से साबित नहीं है| अगर आपको इसका सहीह हदीस से हवाल मिलता है तो हमें ज़रूर बताएं|

यहाँ देखिये→किताब पढ़ने की दुआ

अक़ीक़ह (Aqeeqah) करना फ़र्ज़ है या सुन्नत है?

इस मु’आमले में उल्लमा के बयानात में इख़्तिलाफ है, के यह सुन्नत या फ़र्ज़।

यह वाज़ेह तौर पर कहा जा सकता है के यह सुन्नत-ए-मुअक्किदा है। क्योंकि नबी-ए-करीम ﷺ ने हर मुमकिन कोशिश की के इसे किया जाये।

सहाबा ने अपनी ग़ुरबत की हालत में भी अक़ीक़ह किया, आप ﷺ इस सुन्नत को पर करने पर ज़्यादा ज़ूर दिया।

इसलिए से हर मुसलमान को करना चाहिए, इसे करने से सवाब होगा और बच्चे की हीफाज़त में रहेगा । इंशा अल्लाह

फतवाह इस्लामिया 2/424

इसलिए बिला वजह अक़ीक़ाह को टाला न जाये, पूरे एहतेमाम से इसे करने की कोशिश की जाये।

क्या अक़ीक़ह (Aqeeqah) करना शुक्राना अदा करना है?

जी हाँ, औलाद एक बहुत बड़ी ने’आमत है इसलिए इसका शुक्राना करना बच्चे के आने वाली जिंदगी के लिए बेहतरीन अच्छा होगा। इंशा अल्लाह

क़ुर’आन मजीद में अल्लाह पाक फरमाता है:

“उसमें से खाओ, जो अल्लाह ने तुम्हें ह़लाल रोज़ी आता की है और अल्लाह का शुकर मानो, अगर तुम उसी की इबादत करते हो।”

सुरह-अन-नहल, आयत न. 114

हकीका करना भी एक तरह से अल्लाह पाक का शुकर अदा करना हुआ, इसलिए इसे करने पर ज़्यादा तावज्जु देश चाहिए।

क्या इस्लाम में बच्चे की छट्टी करना सही है?

क्या बच्चे को पहली घुट्टी (तहनीत) देना सुन्नत है?

जी हाँ, इस बात की दलील नीचे दिया गए हदीस-ए-मुबारिका से साबित होती है।

अबू मूसा ने बयान किया:

मेरे यहाँ एक बता पैदा हुआ और मै उस नबी करीम ﷺ के पास ले गया आप ने उसका नाम इब्राहिम रखा उसके लिए खजूर के साथ तहनीत (बच्चे की पहली घुट्टी) की, अल्लाह त’आला से दुआ की के वो उस पर रहमत करे और उस मुझे वापस कर दिया।

(रावि ने मजीद कहा:वो अबू मूसा का बड़ा बेटा था) सहिह अल-बुखारी न. 5467

वज़ाहत: उस वक़्त नबी करीम ﷺ वहाँ पर मौजूद थे तो ज़ाहिर सी बात है उस वक़्त उनके सिवा कोई नही था जो नेक हो, पाक हो, बुज़ुर्ग हो, इबादत गुज़ार हो।
तो सहाबा अपने बच्चो को उनके पास ले जाते थे।

इस वक़्त आपके नज़दीक जो कोई नेक, इबादत गुज़ार, हो तो आप पहली घुट्टी के लिए उसके पास ले ला सकते है|

बच्चे के इस्तक़बाल के लिए अक़ीक़ह सुन्नत है।

बच्चा बड़ा हो गया, तो क्या अब अक़ीक़ह (Aqeeqah) कर सकते है?

जी हाँ, अगर किसी मजबूरी के तेहेद पैदाइश के सातवे दिन अक़ीक़ह न कर सके तो किसी भी मुनासिब दिन अक़ीक़ह किया जा सकता है।

क्या मैं खुद अपना अक़ीक़ह कर सकता/सकती हूँ?

जी हाँ, माँ-बाप की ला-इल्मी या ग़ुरबत की वजह से आपका अक़ीक़ह बचपन में न हो सका हो तो आप खुद अपना अक़ीक़ह कर सकते है।

क्या अक़ीक़ेह (Aqeeqe) का गोश्त वाल्दैन (माँ-बाप) खा सकते है ?

जी हाँ वाल्दैन अपने बच्चे के हकीका का गोश्त खा सकते है। और बाकी सभी रिश्तेदार भी खा सकते है। आजकल के शराब नोशी कर गोश्त खाने वाले मेहमानों को दा’अवत देने से गुरेज़ (परहेज़) करें|

अपने प्यारों से शेयर कर सवाब-ए-जारिया ज़रूर कमायें|

Aqeeqah Karne Ki Dua Aur Tariqa

Is duniya mein ALLAH Ta’ala ne insaan ko paida karne ke sath hi ek se badh kar ne’amatein ata ki hai, jaise maal, aulad, waghairah.

Lekin in tamaam ne’amaton mein aulad ki ne’amat bahut badi hai, to agar ALLAH paak ne aap ko aulaad jaisi nemat ata ki, to saatwe din uska naam rakhein aur aqeeqah karein.

Aqeeqah Kya Hota Hai?

Aqeeqah us zabiha ko kehte hai jo naumolud ki taraf se kiya jata hai.

Yeh bhi kaha gaya hai ki aqeeqah un balon ko kaha jata hai jo maa ke pet mein paida hone wale bachche ke sar mein nikalte hai.

Chunki un balon ko naumolud ke sar se zibah ke waqt mund diya jata hai. Isliye kisi bache ki paidaish par jo bakri zibah ki jati hai, use aqeeqah kaha jata hai.

‘Aq’ ka ek mayine phadna aur katna bhi hota hai. Isliye bhi naumolud ki tarah se zinab ki jane wali bakri ko aqiqa kaha gaya. Kyunki us (janwar) ke jism ke tukde kar diye jate hai aur uske pet ko cheer-phaad diya jata hai.

Bul Gul Maraam Jild no. 2, Safah no. 873

Yahan→Miswak Ke 70 Fayde dekhiye!

Aqeeqah Ki Ehmiyat

Irshad-e-bari Ta’ala hai “ALLAH ka shukr ada karo, agar tum usi sirf usi ki ‘ibaadat karte ho”.

Surah Nalh, Ayat no. 114

“Tum Mera zikr karo, Mai bhi tumhe yaad Karunga aur shukr ghuzari karo na shukri se bacho”.

Surah Baqarah, Ayat no. 152

Isliye aulad jaisi nemat ke milne par akika karke ALLAH paak ka shukar ada karna chahiye.

Akike ka ghost khud bhi khaya ja sakte hai. Dost ko bhi diye aur khilaya jaa sakta hai. Ghareebon miskinon aur rishtedaron ko paka kar bhi khilaya jaa sakta hai.

Hadees Ki Roshni Mein Aqeeqah

1.”Bachche ke sath aqeeqah (laazim) hai. Lihaza tum uski tarah se qurbani karo aur uski takleef ko dor karo”.

Raawi- Salaam Bin Aamir Ra. A., Al-Bukhari no. 5472, Abu Dawud no. 2839, Ibn Majah no. 3184, An-Nisai no. 4220, At-Tirmidhi no. 1361

2. “Jiske yaha koyi bachcha paida ho aur wo uski taraf se kurbari karna chahe to zarur kurbani kare”.

Abdullah Bin Umar R. A.

Sunan An-Nisai no. 4218

3. “Har bachcha apne Aqeeqah ke ewaz girwi hota hai. Paidaish ke saatwe Din Uska Aqeeqah kiya jaye”.

Sunan An-Nisai, no. 4226, Ibn Majah, no. 3165,  At Tirmidhi no. 1368

4. ” Ladke ki taraf se do barabar (ek jaisi) bakriyan aur ladki ki taraf se ek bakri”.

Sunan An-Nisai no. 4221 Ibn Majah no. 3162

5. “Aap ﷺ ne Hassan R. A. ka Aqeeqah kiya aur 2-2 dumbe zibah kiye”.

Sunan An-Nisai no. 4225

6. “Hamein ALLAH paak ke Rasool ﷺ ne hukm diya ki ladke ki taraf se 2 bakeiyan aur ladki ki taraf se ek bakri aqeeqah mein Qurbani ki jaye”.

Ibn Majah no. 2163 At Tirmidhi no. 1359

7. ” Aap ﷺ ne Aqeeqah kiya, phir farmaya: Ae Fatimah is ka sar mundwao aur is ke baalon ke wazan ke barabar chandi sadqa karo”.

At Tirmidhi no. 1365

8. “Fatimah R. A. ne Hazrat Hasan R. A. aur Hazrat Hussain R. A. ke baal taul kar un ke wazan ke barabar chnadi saqda ki”.

Muwatta Imaam Malik no. 1121, Safaah no. 371

9. “Aqeeqah kiye jaye bachche ki taraf se lekin ke sar mein khoon lagana (aqiqah ke janwar ka jaisa ki jamana-e-jaheeliyat mein riwaz tha) na jaye”.

Ibn Majah no. 3166

Yahan→Ayat-e-Sakina Ki Fazilat dekhiye!

Maloom hua akika (aqeeqah) Islam ki sunnaton mein se ek sunnat hai.

Aam Ahle ilm khusoosan Ibn Abbas R. A., Ibn Umar R. A. Ayesha R. A., Fukha e Tabain R. A., aur kayi lmaam Ahmad Bin Hambal R. A. Aur Allaama shaukani R. A. Shamil hai, ke nazdeek aqeeqah sunnat hai.

Baaz Ullema ne ise wajib kaha hai. Jabki Anhaaf ke nazdeek hakika sunnat nahi balki sirf mubaah aur jaiz hai.

Sheikh Inne Jabreen ke nazdeek aqeeqah sunnat muakkeda hai. Sheikh In Asigin R. A. ne bhi aksar ahle ilm ke nazdeek ise sunnat muakkida hi kaha. Albatta Hasan Basri R. A. ke nazdeek aqeeqah karna farz hai.

Dikh Ul Hadees Jild no. 2, Safah no. 487 – no. 488

Agar Aqeeqah Karne Ki Kisi Ki Haisiyat Na Ho?

ALLAH Ta’ala ne farmaya:

“Apni Taqat Bhar ALLAH Ta’ala se Darte raho”.

Surah Taghabun, Ayat no. 16

” ALLAH Ta’ala kisi Nafs ko uski Taqat se Zyada Takleef (Azmaish) nahi deta”.

Surah Baqarah, no. 285

Nabi kareem ﷺ ne farmaya:

“Jab mai tumhe kisi kaam ka hukm dun to jitni tum mein taqat ho, us par amal karo”.

Muslim, An-Nisai

Sheikh Ibn Asimin R. A. ne kaha

“Agar koyi shakhs apni aulad ki paidaish ke waqt ghareeb hi to us par aqeeqah karna zaruri nahi hai kyunki wo aajij hai aur aajij ya bebas ki wajah se ibadat saqib ho jati hai”.

Fatwa Islamiya Jild no. 2, Safah no. 427

Imaam Ahmad aur Imaam Manzar R. A. ne kaha ki ” Aisa shakhs aqeeqah karne ke liye karz le le. Ummeed hai ki ALLAH paak use sunnat zinda karne ki wajah se pura pura ajar de”

Fiqh-ul-Hadees Jild 2, safah no. 494

Yahan→Musafir Ki Dua dekhiye!

Kya Saatwe Din Ke Baad Aqeeqah Kiya Jaa Sakta Hai?

Paidaish ke saatwe roz ke baad bhi aqeeqah kiya jaa sakta hai. Phir chahe wo baligh hi kyun na ho gaya ho. Kyunki wo bachcha aqeeqah na hone ki wajah se abhi tak girwi hai.

Ji han, saatwe din hi aqeeqah karna sunnat hai,

Rasool ALLAH ﷺ ne farmaya:

“Har ladka apne aqeeqah ke badle girei rakha hua hai, isliye uski taraf se saatwe (7) din qubrani ki jaye aur uska naam rakha jaye”.

Sunan Abu Dawud, no. 1065 – Saheeh

Kya Bachche Ka Sar Mundwana Chahiye?

Samrah R. A. ne bayan kiya ke, Rasool ALLAH ﷺ ne farmaya:

“Ladka uske aqeeqeh par girwi hai, is ke liye saatwe din zibah kiye jaye, us ka naam rakha jaye aur us ka sir mundwaya jaye”.

Jami’a At Tirmidhi no. 1522

Bachche Ke Girwi Hone Ka Matlab?

“Bachche ke girwi hone ka matlab Imaam Ahmad R. A ki ray mein ye hai ki bachche ka agar aqeeqah na kiya jaye to wo apne maa baap ki sifarish na kar sakega”.

Yeh bhi kaha gaya hai ki yeh aqiqa ke wajib hone ke mafhoom mein hai. Jaisa ki karz mein adayegi kiye baghair girwi cheez wapis nahi ho sakti aur yeh bhi kaha gaya ki bachcha apne balon aur mail-kuchail ke sath gurwi hoti hai yani girwi ko chhudana chahiye “.

Un Al Mabood-Bahawala-Abudaul, Jild no. 3, Safah no. 289

Rasool ALLAH ﷺ ne farmaya:

” Har ladka apne aqeeqeh ke badle gurwi rakha hua hai, isliye uski taraf se saatwe din qurbani ki jaye aur uska naam rakha jaye.

Sunan Abu Dawud, no. 1065 -Saheeha

Isi tarah saudi majlise Ifta ka fatwa hai “saatwe roz ke baad bhi akikah kiya jaa sakta hai lekin der karna sunnat ke khilaf hai”.

Fatwa Islamiya, Jild no. 2, Safah 426

Yahan→Shaban Ke Mahine Ki Fazilat dekhiye!

Aqeeqah ke janwar mein kurbani ke janwar ki shart?

Is baat mein bhi Ullama hazraat ki mukhtalif raye hai. Sukani R. A. kehte hai ki akikah ke janwar mein wo shart nahi lagayi gayi hjayengi jo kurbani ki janwar ki hai aur yahi baat haq hai

Nayl-al-Awtar, Jild no. 3, Safah no. 506

Abdur Rahmaan Mubarakpuri R. A. ka kahna hai ” Kisi bhi sahi hadees se yeh sharte lagana sabit nahi. Balki kisi jaiz hadees se bhi yeh sabit nahi”.

Tuhfa Al Ahuji- Jild no. 5, Safah no. 399, Fathul Hadess Jild no. 2, Safah no. 493

Albatta Ibn Kadama R. A. ki raye mien “Aqeeqe ki janwar mein bhi un aebon se bacha jayega jinse qurbani ke janawar mein bacha jata hai”.

Al Mughni, Jild no. 13, Safah no. 999, Fiqh-ul-Hadees, Jild no. 2, Safah no. 493

Aqeeqe Ka Janwar Nar Ho Ya Mada?

Aqeeqeh mein nar ya mada dono hi janwar zibah kiye jaa sakte hai. Isliye ki Aap ﷺ ka irshad hai:

” Ladke ki taraf se do bakriyan aur ladki ki taraf se ek bakri xibah ki jaye. Nar ho ya mada tumhe koyi cheez nuksan nahi degi”.

Umme Kurj Kabiya R. A. Abu Dawud no. 2835
Tirmidhi no. 1360

Kya Aqeeqah Mein Oont Aur Gaye Ki Qurbani Sahi Hai?

Farman-e-Rasool ﷺ hai ke:

“Aqeeqah mein qurbani ke liye jin jaanwaron ka zikr milta hai, wo bakri ke liye jin janwaron ka zikr milta hai, wo bakri aur dumba hai.

Jaise ki Umme Kurj R. A. se Abu Dawud (no.2835) mein, Ibn Abbas R. A. se Sunan An-Nisai (no. 4222) Agan Bin Shoaib R. A. se Abu Dawud mein (no. 2842)

Hadees mein hai ki aap ﷺ ne farmaya:

“Jiske yaha koyi bachcha paida ho aur wo uski tarf se qurbani karna chahe to ladke ki taraf se do aur ladki ki taraf se 1 bakri kurbani kare”

“Hasan R. A. aur Hussain R. A. ke aqeeqah mein mendha zibah hua”.

Abu Dawud no. 2841, Ibn Abbas R. A.

Shukani R. A. ne likha hai ki

“Jamboor (Ullema) gaye aur bakri ko ( aqeeqah ke liye) kafi karar dete hai. Yani jaiz karar dete hai”.

Nailul Awtaar, Jild no. 3, Safah no. 537

Docter Wahba Zahili ki raye mein aqeeqah bhi qurbani ki tarah anaam yani unth, gaye, bhed aur bakri se kiya jaa sakta hai.

Jin Ulema ne unth aur gaye ki qurbani ko aqeeqah ke liye jaiz kaha hai, un ki daleel Anas R. A. se marwi yeh hadees hai:

“Bachche ki taraf se unth, gaye, bhed aur bakri sr aqeeqah kiya jaa sakta hai. Lekin yeh riwayat sabit nahi”.

Jaise ki Imaam Haishmi R. A. ne kaha ki is ki sanad mein Mashada Bin Al Yasra R. A. Rawi jhutha hai. Chunki sahi hadees mein sirf bakri aur dumba zibah karne ka zikr hai, isliye inhi ki qurbani karna behtar hai”.

Fiqh-ul-Hadees- Jild no. 2, Safah no. 491

Yahan→Itikaf Ka Tarika Aurton Ke Liye dekhiye!

Kya Ladke Ki Taraf Se Ek Janwar Bhi Qurbani Kiya Jaa Sakta Hai?

Ibn Abbas se riwayat hai ki:

” ALLAH ke Rasool ﷺ ne Hasan R. A., aur Hussain R. A. ki taraf se aqiqah mein 1-1 dumba ziban kiya”.

Abu Dawud no. 2841

Sheikh Al Bank R. A. ne kaha ki yeh riwayat sahi hai lekin Nisai ki wo riwayat zyada sahi hai jismein 2-2 ka zikr hai.

Nisai no. 4225, Ilm-e-Abbas R. A.

Ibn Umar R. A. apne ghar walon ki taraf se aqeeqah mein (ladka ho ya ladki) 1-1 bakri zibah karte the.

Muwatta Imaam Malik, no. 1122, Safah no. 371

Urwah Bin Zubair R. A. apni aulad ki taraf se ladka hota ya ladki 1-1 bakri aqeeqah mein zibah karte the.

Muwatta Imaam Malik, no. 1125, Safah no. 371

Shokani R. A. ne kaha ki aap ﷺ ka aqeeqah mein ek bakri quran karna is baat ka suboot hai ki do janwar zaruri nahi balki musatbah hai.

Fiqh-ul-Hadees, Jild no. 2, Safah no. 493

Chunki qual ko fai’al par tarjih hoti hai. Isliye ladke ki taraf se 2 aur ladki ki taraf se 1 janwar hi zibah karna behtar hai.

Yahan→Marne Ke Bad Ki Dua dekhiye!

Aqeeqah Ke Janwar Aur Ghost Ka Masraf

Hadees-e-Mubarika

Rasool ALLAH ﷺ se koyi rahnumayi nahi milti. Albatta doctor Wahba Zahili Ka kahna hai ki aqeeqah ke janwar ke ghost aur khaal ka hukm qurbaniyon ki taraf hi hai.

Yani uska ghost khaya jaa sakta hai, khilaya jaa sakta hai aur us se sadqa kiya ja sakta hai.

Lekin us ki kaoyi chiz bechi nahi ja sakti.

Fiqh-ul-Islami, Hadees no. 2, Safah 496

Aqeeqah Ke Badle Janwar Ki Qimat Sadqa Kar Dena Kaisa hai?

Ibn Kadama R. A. ne kaha: “Aqeeqah ke janwar ki kimat sadqa karne se aqeeqah ke janwar ko zibah karna zyada afzal hai”.

Imaam Ahmad R. A. ne kaha ki:
” Jab kisi ke paas etna maal na ho ki wao aqeeqah kar sake to karz le le kyunki yeh aisa zabiha hai jiska Nabi Kareem ﷺ ne hukm diya hai”.

Fiqh-ul-Hadees, Jild no. 2, Safah no. 495

Aqeeqah Ke Janwar Ki Qeemat Fund Mein Jama Karana Kaisa Hai?

Aqeeqah ka badal nahi hoga. Buraidah R. A. ka bayan hai ki daur-e-jahiliyat mein jab ham mein se kisi ke yaha bachcha paida hota to wo ek bakri zibah karta aur us ka khoon bachche ke sari par chuped deta tha. Magar jab se ALLAH Ta’ala ne hame Islam ki daulat se nawaza hai, ham ek bakri zibah karte hai, bachche ka sar mundwate hai aur us ke sar par zaafraan mal dete hai.

Abu Dawud, no. 2843

Aqeeqah Ka Irada Na Ho To Paidaish Ke Din Naam Rakhna Kaisa Hai?

Agar bachche ke aqeeqah ka irada na ho to paidaish ke din hi uska naam rakhna jaiz hai. Isliye ki Abu Musa R. A. ke yaha jab bachcha paida hai to aap use lekar Nabi kareem ﷺ ke pas gaye. Aap ﷺ ne bachche ka naam Ebraheem rakha aur khajoor ko danton se chabaa kar use chataya.

Saheeh Al-Bukhari, no. 5447

“Aisa hi Aap ﷺ ne Abdullah Ibn Zubair R. A. ki paidaish par bhi kiya tha”.

Saheeh Al-Bukhari, no. 5489

ALLAH Ta’ala se dua hai ki wo hame sunnat ke mutabik zindagi guzarne aur bidat aur fizool rasmon se dor rahne ki taufique ata kare. Ameen

Yahan→Cheenk Aane Ke Baad Ki Dua dekhiye!

Kya Waqayi Aqeeqah Ki Dua Hai?

Aage ham aqeeqah ke bare mein hadees aur Qur’an ke hawale se janenge. Saath hi aqeeqah se jude kuch sawalon ke jawab bhi aap padhenge ye wo sawal hote hai. Jo isse jude masail hote hai jinke bare mein hamein asani se maloom nahi ho pata hai. Yeh aam taur se logon ke zehno mein hote hai.

Yun to aqeeqah ki dua aapko internet par har kisi websites par dekhne ko mil jayegi.

Lekin internet se hadees ki duayen bila sahi hawale yunhi hasil karna gunah ka sabab bhi ban sakta hai.

Jiski ham hadees samajh kar amal mein le rahe ho wo ho sakta hai ke hadees na bhi ho.

Ye janna bahut zaruri hai ki iska hawala sahi bhi hai ya nahi? Kya yeh dua hame padhni bhi chahiye ya nahi?

Aqeeqah Karne Ki Dua Kya Hai?

Aqeeqah karne ki dua ke bare mein ye jaan lena behad zaruri hai ke ye dua jo aapko internet par hazrat Ayesha R. A. ke hawale se na jane ketni websites par padhne ko mil rahi hai.

Aqeeqah karne ki yeh dua kisi bhi saheeh hadees se sabit nahi hai. Agar aapko iska sahih hadees se hawala milta hai ti hamein zarur batayen.

Aqeeqah Karna Farz Hai Ya Sunnat Hai?

Is mu’amle mein Ullama ke bayanaat met ikhtilafaat hai, ke yeh sunnat hai ya farz.

Yeh wazeh taur par kaha jaa sakta hai ke yeh sunnat e muakkida hai. Kyunki Nabi Kareem ﷺ ne har mumkin koshish ki ke ise kiya jaye.

Sahaba ne apni ghurbat ki haalat me bhi aqeeqah kiya, aap ﷺ is sunnat ko pura karne par zyada zor diya.

Isliye ise har musalmaan ko karna chahiye, ise karne se sawab hoga aur bachche ki hifazat hogi. Insha ALLAH

Fatwah Islamiya 2/424

Isliye bila wajah aqeeqah ko taala na jaye, pure ehtemaam se ise karne ki koshish ki jaye.

Yahan→Mayyat Ki Maghfirat Ki Dua dekhiye!

Kya Aqeeqah Karna Shukrana Ada Karna Hai?

Ji han, aulaad ek bahut badi nemat hai isliye iska shukrana Karna bachche ke aane wali zindagi ke liye behtareen hoga. Insh ALLAH

Qur’an paak mein ALLAH paak farmata hai:

“Usmein se Khao, jo ALLAH ne tumhe halaal rozi ata ki hai aur ALLAH Ka shukar mano, agar tum USI ki ibadat karte ho”

Surah An-Nahl, Ayat no. 114

Hakika karna bhi ek tarah se ALLAH paak Ka shukar ada karna hua, isliye ise karne par zyada tawajju dena chahiye.

Kya Islaam Mein Bachche Ki Chhatti (6) Karna Sahi Hai?

Kya Bachche Ko Pahli Ghutti (tehneet) Dena Sunnat Hai?

Ji han, is baat ki dalil niche diye gaye hadees se sabit hoti hai.

Abu Musa ne bayan kiya:

“Mere yaha ek bachcha paida hua aur mein use Nabi Kareem ﷺ ke pas le gaya aap ne uska naam Ebraheem rakha uske liye khajoor ke sath tahneet ( bachche ki pahli ghutti) ki, ALLAH Ta’ala se dua hai ki wo us par rahmat kare aur use mujhe wapis kar diya.

Saheeh Al-Bukhari no. 5467

Wazaahat: Us waqt Nabi Kareem ﷺ waha par maujood the to zahir so baat hai us waqt unke siwa koyi nahi tha jo nek ho, buzurg ho, ibadat guzar ho to sahaba apne bachche ko unke pas le jate the.

Is waqt apke nazdeek jo koyi nek, ibadat guzar ho to ap pahli ghutti unse dilwa sakte hai. Bachche ka istaqbaal ke liye aqeeqah sunnat hai.

Yahan→Qabristan Mein Dakhil Hone Ki Dua dekhiye!

Bachcha Bada Ho Gaya, To Kya Ab Aqeeqah Kar Sakte Hai?

Ji han, agar kisi majburi ke tehed paidaish kr saatwe din aqeeqah na kar sake to kisi bhi munasib din aqeeqah kiya ja sakta hai.

Kya Mein Khud Apna Aqeeqah Kar Sakta Hun?

Ji han, maa baap ki la-ilmi ya ghurbat ki wajah se apka aqeeqah bachpan mein na ho saka ho to aap khud apna aqeeqah kar sakte hai.

Kya Aqeeqah Ka Ghost Waldain (Maa-Baap) Kha Sakte Hai?

Ji han, waldain apne bachche ke haqiqa ka ghost kha sakte hai. Aur baki sabhi rishtedar bhi kha sakte hai. Aaj kal ke sharan noshi kar ghost khane wale mehmano ko da’awat dene se gurez (parhez) karein.

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